आखिरी सासें लेती,
थकी-हारी, चरमराई,
हिंदी की जो है हालत,
उसे बचा सके दवा न दुहाई।
अंग्रेजी का अत्यधिक उपयोग,
नहीं है इसका कारण,
ना ही इस बात पे रोने से,
टलेगा इसका मरण।
हिंदी के पुनर्जन्म का,
बस एक ही है रास्ता,
अपने स्तर पर उसका प्रचार,
और भाषा के प्रति सच्ची आस्था।
यूँ तो भाषा कभी मरती नहीं,
वो होती है अमर,
पर ऐसे जीवन का भी क्या ही फायदा,
जब अपने ही घर बैसाखी पर निर्भर।
– अभिषेक ‘देसी देशपांडे
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