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थम सा गया ये देश.

दिशाहीन, उलझा सा, असमंजस से जूझता हुआ, मेरा देश ऐसा तो न था.

घोटालो से चरमराया विश्वास, लोकतंत्र का बना मज़ाक. अर्थव्यवस्था की चरमरायी सी हालत, जाति-धर्म के अनसुलझे विवाद, क्या मेरा देश ऐसा ही था?

पर इन सब के बीच कम से कम एक आशा थी, की कुछ बदलेगा, सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं, तो कम से कम होगा जनता का नैतिक विकास.

लेकिन किसे पता था थमेगी बढ़ने की चाह, और उठेगा लोकतान्त्रिक संस्थानों में विश्वास, मेरा देश ऐसा तो न था.

प्रतिदिन समाचारों से मिली निराशा, और देश के नेताओं की मुह से निकली भाषा. डर सा लगता है अब मुझे इस देश के बारे में सोच के, थक से गए है हम, और थम सा गया है यह देश.

-अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे

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