चाय की टपरी
सबसे अच्छी चाय कभी किसी कैफ़े में नहीं मिलती। वो सड़क के किनारे मिलती है, एक टपरी पर, जहाँ चाय बनाने वाला आदमी आपका नाम नहीं जानता, लेकिन आपकी चाय कैसी चाहिए — ये जानता है।
टपरी का दर्शन
हर टपरी एक लोकतंत्र है। यहाँ CEO और रिक्शावाला एक ही बेंच पर बैठते हैं। एक ही कुल्हड़ से पीते हैं। चाय के सामने सब बराबर हैं।
मेरे ऑफ़िस के बाहर एक टपरी थी — रामू भैया की। रामू भैया को किसी ने चाय बनाना नहीं सिखाया था। उन्होंने तीस साल में ख़ुद सीखा था, और तीस साल की चाय में एक गहराई होती है जो किसी रेसिपी बुक में नहीं मिलती।
चाय बनाने की कला
रामू भैया की चाय का रहस्य सरल था: धीरज। वो चाय को उबालते नहीं थे — पकाते थे। दूध, पानी, चीनी, अदरक, इलायची — सब कुछ एक साथ, धीमी आँच पर। जब चाय का रंग गहरा भूरा हो जाता, तब वो छानते थे।
कभी जल्दी नहीं करते थे। चाहे लाइन कितनी भी लंबी हो।
“चाय जल्दी नहीं बनती,” वो कहते थे। “और अगर बना भी दो, तो वो चाय नहीं होती।“
एक कप में पूरी दुनिया
मुझे लगता है कि भारत को समझना है तो एक टपरी पर बैठकर चाय पीजिए। वहाँ आपको राजनीति मिलेगी, क्रिकेट मिलेगा, गॉसिप मिलेगी, फ़लसफ़ा मिलेगा — सब कुछ एक कप चाय में।
और बिल? दस रुपये। दुनिया की सबसे सस्ती therapy।