फिर निकल चला मैं।
Category: Hindi
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पलायन
घूमता-खोजता, चलता-फिरता,
फिर निकल चला मैं।पहले शिक्षा, फिर नौकरी,फिर शिक्षा और दूसरी नौकरी।कभी क़स्बा, कभी शहर,कभी देश, कभी विदेश।हर जगह संभावनाएं खोजता,कभी दुसरो को, कभी खुद को ढ़ुंढ़ता।प्रवासी कहिये या अप्रवासी,जड़ो से उजड़ा हुआ कहिये या जड़हीन।घूमता-खोजता, चलता-फिरता,फिर निकल चलूँगा मैं। -
क्या हिंदी जीवित रहेगी?
आखिरी सासें लेती,
थकी-हारी, चरमराई,
हिंदी की जो है हालत,
उसे बचा सके दवा न दुहाई।अंग्रेजी का अत्यधिक उपयोग,
नहीं है इसका कारण,
ना ही इस बात पे रोने से,
टलेगा इसका मरण।हिंदी के पुनर्जन्म का,
बस एक ही है रास्ता,
अपने स्तर पर उसका प्रचार,
और भाषा के प्रति सच्ची आस्था।यूँ तो भाषा कभी मरती नहीं,
वो होती है अमर,
पर ऐसे जीवन का भी क्या ही फायदा,
जब अपने ही घर बैसाखी पर निर्भर।– अभिषेक ‘देसी देशपांडे
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मलहम-ए -खिचड़ी
आपको देख दिल पे चल जाती है अभी भी छुरिया,
पर आपने तो फेका था हमें जैसे सीली हुई भुजिया।खा पी कर ले रही हो तुम डकार,
पर क्या कभी याद किया तुमने पुराना प्यार?धराशायी मन, टूटे दिल की सिसकी,सोचा शांत करू इसे मार मदिरा की चुस्की।
पर मदिरा की राह लेते है असफल और बेकार,हमने अपनाया खिचड़ी, पापड़, और अचार।-अभिषेक देशपांडे ‘देसी’ -
भुलक्कड़ भारत
मैं:
विचलित मन, कुंठित जीवन,
दिशाहीन, घटनाओं से सहमा, घबराया हुआ।
हर क्षण है मरता मेरे अन्दर यह भारत,
और भारतीयता की भावना।वो:
विनष्ट तन, निर्जीव जीवन,
मैं ही थी वो घटना जिसने तुम्हे था जगाया।
मेरी मृत्यु के साथ मरी वो कल्पना,
जिसे हमने भारत कहलाया।भारत:
घटनाएं तो रोज़ होती है, मैं हो चूका उसका आदि,
हिम्मत है तो तुम संभालो इतनी बड़ी आबादी।
घटनाएं तो होती रहेंगी, इसका है एक ही उपाय,
देश को छोड़ देने के अलावा तुम्हारे पास क्या ही है पर्याय?
मैं तो नहीं बदलूँगा, रहना है तो रहो,
वरना नापो रास्ता।मैं:
तो क्या मेरा संघर्ष व्यर्थ जाएगा?
वो:
तो क्या मेरी मृत्यु व्यर्थ जायेगी?
भारत:
संघर्ष? मृत्यु? किसकी?
मैं तुम्हे जानता तक नहीं।
इतने सालो से यहाँ रहते हो,
इतना भी नहीं समझे की मैं बहुत जल्दी चीज़े भूल जाता हु।मैं:
अरे भाई, क्रिकेट का स्कोर क्या हुआ है?
गुजरात के चुनाव कौन जीत रहा है?वो:
ओह, तो तुम मुझे भूल भी गए?
तुम वही हो ना जो मेरे नाम रख रहे थे।
इंडिया गेट पर नारे लगाने वाले तुम्ही थे ना?भारत:
हा हा हा।
मैं:
यार आज फिर दिल्ली में एक घटना घटी,
बेचारी केवल 15 वर्ष की थी।वो:
विनष्ट तन, निर्जीव जीवन,
मैं हूँ वो घटना जिसने तुम्हे फिर से है जगाया।भारत
हा हा हा, फिर आ गए।
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किम्कर्त्व्यविमुढ
सब कुछ था स्थिर, अविचलित, शांत सा,
अचानक से इस दुविधा ने लाया एक बवंडर सा।क्या करे क्या ना करे के दोराहे पर मैं हु खड़ा,
असमंजस से जूझता, पर इरादों पर अड़ा।इस पार है निराशा, उस पार आशा की किरण,
बीच मझदार का सफ़र है, जिस पर तय होगा जीवन-मरण।-अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे
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थम सा गया ये देश.
दिशाहीन, उलझा सा, असमंजस से जूझता हुआ,
मेरा देश ऐसा तो न था.घोटालो से चरमराया विश्वास,
लोकतंत्र का बना मज़ाक.
अर्थव्यवस्था की चरमरायी सी हालत,
जाति-धर्म के अनसुलझे विवाद,
क्या मेरा देश ऐसा ही था?पर इन सब के बीच कम से कम एक आशा थी,
की कुछ बदलेगा,
सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं,
तो कम से कम होगा जनता का नैतिक विकास.लेकिन किसे पता था थमेगी बढ़ने की चाह,
और उठेगा लोकतान्त्रिक संस्थानों में विश्वास,
मेरा देश ऐसा तो न था.प्रतिदिन समाचारों से मिली निराशा,
और देश के नेताओं की मुह से निकली भाषा.
डर सा लगता है अब मुझे इस देश के बारे में सोच के,
थक से गए है हम,
और थम सा गया है यह देश.-अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे
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App आये बहार आयी.
रविवार का था वोह दिन,
जब रह ना पा रहा था भोजन तकनीक के बिन.
यह दिन का हसने का, मिलने जुलने का,
संगणक और इन्टरनेट से बाहर निकल, हर व्यक्ति विशेष से मिलने का.Nokia का नाम देख याद आयी मुझे उस प्रसिद्द नागिन की चाल,
सरलता और सुदृढ़ता के बल पर जिस Nokia ने किया था अपने दुश्मनों का बुरा हाल.
३२१०, ११००, २१०० और इ-७२ से जुडी वोह सुनहरी यादें,
Nokia की धुन की आड़ में पनपता प्रेम और कसमें वादें.Nokia से ध्यान हटा तो दिखा एक मंच सुस्सजित एवं बड़ा,
एक तरफ था भारत का तकनिकी-गुरु, तो दूसरी ओर जूनून का प्रमुख-रसोईया था खड़ा.
इन दोनों में से किसी एक का पक्ष लेना तो था नामुमकिन,
एक फूल दो माली वाली थी समस्या एक हसीन.
एक तरह से अच्छा ही हुआ मुझे मंच पर नहीं बुलाया,
नहीं तो फूल तो क्या fool बना कर राजीव ने रहता मुझे सताया.लाल सोमरस के प्यालो के साथ संध्या धीरे धीरे रही थी बढ़,
नशे के साथ तकीनीकी एवं पाककला का ज्ञान भी दिमाग पे रहा था चढ़.
समां भी बंध सा गया था, कुछ चेहरे थे जाने कुछ अनजाने,
ब्लॉग की दुनिया से निकल कर, आधे तो आये थे ताज के भोजन के बहाने.फिर जैसे ही app आयी, आयी बहार,
Chaplin महोदय की चाल चलते विकास हो, या चित्रो में चेहरों का होता संहार.
मुझे पता है कुछ apps ऐसी हैं जिनमे बसी है मेरी जान,
क्योकि वोह मेरे दोनों शौक पूरे करे – भोजन और सामान्य ज्ञान.फिर गरिष्ट भोजन, तस्वीरों और अच्छी बातो के साथ ख़तम हुई वोह शाम,
ज्यादा खा-पी लिया, अब सिर्फ आएगा Eno काम.-अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे
Nokia AppTasting और Indiblogger को मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट.
कृपया ध्यान दे:
Technology शब्द के लिए मैंने तकनीक का प्रयोग किया, मैं प्रौद्योगिकी और तकनीक के बीच झूल रहा था. भाषा में हुई किसी भी गलती के लिए माफ़ी चाहूँगा. इस बात पे मुझे हृषिदा की चुपके चुपके का एक संवाद याद आ गया:
भाषा अपने आप में इतनी महान होती हैं की कोई उसका मजाक उड़ा ही नहीं सकता.
Featured image by Shivani: निखिल, विकास, मैं और विकास में पूरी तरह खोयी हुई कन्यायें.
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किस्सा कचोरी का…
रविवार का था वह एक आम सा दिन,
दूरदर्शन पर चल रहा था चंद्रकांता, कैसे रहते लोग कड़क सी चाय के बिन.
चाय के साथ था कुछ खस्ता, रस्क, और नमकीन,
पर जब घर आई कचोरी और जलेबी, तब खिस्की ज़बान तले ज़मीन.समोसा, आलू बोंडा और मंगोड़े भी देते है टक्कर,
पर कौन रह सकता है कचोरी के स्वाद से बचकर.कचोरी कई बार अपना रूप बदलती,
राजस्थान मैं पूरी तो गुजरात मैं लड्डू बनती.
रूप के संग इसका ह्रदय भी बदलता
कभी मूंग कभी आलू कभी प्याज और कभी मटर से इसका दिल है धड़कता.दिल्ली मैं चाट की शोभा बढाती राजकचोरी,
या दही सौंठ के अभिषेक से बनी दही कचोरी
उत्तर प्रदेश मैं आलू रस्सा संग रस रचाए
कचोरी हर रंग रूप मैं हमें है भाये.इंदौर मैं सराफे का वजन,
या कोटा-जयपुर मैं इसका प्याज से लगन
गंगा मैय्या किनारे मोहन पूरी वाला,
कचोरिया ऐसी जुग जुग जिए बनाने वाला.मेरा तो है बस यही अंतिम विचार,
कचोरी के है चार यार
चटनी, सौंठ, दही और तलने वाले का प्यार.-अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे
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विस्फोट, तुम फिर आ गए!
विस्फोट, तुम फिर आ गए!
जीवन की कीमत तो तुमने समझी नहीं
कम से कम
भय की परिभाषा तो समझ लेते.मुंबई शहर में लोग हर क्षण है मरते
ज़िन्दगी की भागदौड़ में दबते कुचलते
इस भाग दौड़ थकान के बीच
किसे है समय भयभीत होने का.भय है बढती महंगाई का, नौकरी का,
भय है घर बार का, सब्जी तरकारी का.
अरे विस्फोट तुमसे हम क्यों डरे
मुंबई की बारिश की तरह हो तुम, रोज आते जाते,
रोज की बारिश से
किसे है समय भयभीत होने का.अब ये मन भयभीत नहीं
यह बस सुन्न हो चुका है, थक चुका है
एक प्रश्न पूछूँ तुमसे – उत्तर दोगे?
क्या तुम नहीं थके?– अभिषेक देशपांडे ‘देसी’
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काश ये दिल होता Tupperware का
हम प्यार करते थे उनसे बेशुमार,
उनके इश्क मैं हुए थे बीमार
हमे लगा वो भी है उतनी ही बेक़रार,
कर बैठे प्यार का इज़हार.फिर क्या कहे क्या हुआ
अच्छे खासे दिल का मालपुआ हुआ,
दिल तो हमारा था कोमल और नाज़ुक
पर जब टूटा तो आवाज़ आई जैसे चले कोई चाबुक,
कांच की तरह टुकड़े हुए उसके हज़ार,
सारे अरमानो का हुआ मच्छी बाज़ार.काश ये दिल न होता कांच जैसा brittle
और हर बार ना होते इसके टुकड़े little little,
अगर ये होता Tupperware जैसा मज़बूत
गिर पड़ संभल कर भी रहता साबुत,
प्यार की गर्मी और चाहत की सर्दी झेलता
हर मौसम येह ख़ुशी ख़ुशी खेलता,
हर सप्ताह नयी नयी गृहणियो के संग पार्टी मनाता
कुंवारी ना सही, शादीशुदा का ही संग पाता.पर क्या करे यही है कुदरत का न्याय,
Tupperware के दिल का कभी ना खुल सकेगा अध्याय… कभी ना खुल सकेगा अध्याय.Dedicated to all the losers in the world :)…