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Category: Hindi (page 2 of 4)

थम सा गया ये देश.

दिशाहीन, उलझा सा, असमंजस से जूझता हुआ,
मेरा देश ऐसा तो न था.

घोटालो से चरमराया विश्वास,
लोकतंत्र का बना मज़ाक.
अर्थव्यवस्था की चरमरायी सी हालत,
जाति-धर्म के अनसुलझे विवाद,
क्या मेरा देश ऐसा ही था?

पर इन सब के बीच कम से कम एक आशा थी,
की कुछ बदलेगा,
सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं,
तो कम से कम होगा जनता का नैतिक विकास.

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App आये बहार आयी.

रविवार का था वोह दिन,
जब रह ना पा रहा था भोजन तकनीक के बिन.
यह दिन का हसने का, मिलने जुलने का,
संगणक और इन्टरनेट से बाहर निकल, हर व्यक्ति विशेष से मिलने का.

Nokia का नाम देख याद आयी मुझे उस प्रसिद्द नागिन की चाल,
सरलता और सुदृढ़ता के बल पर जिस Nokia ने किया था अपने दुश्मनों का बुरा हाल.
३२१०, ११००, २१०० और इ-७२ से जुडी वोह सुनहरी यादें,
Nokia की धुन की आड़ में पनपता प्रेम और कसमें वादें.

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किस्सा कचोरी का…

रविवार का था वह एक आम सा दिन,
दूरदर्शन पर चल रहा था चंद्रकांता, कैसे रहते लोग कड़क सी चाय के बिन.
चाय के साथ था कुछ खस्ता, रस्क, और नमकीन,
पर जब घर आई कचोरी और जलेबी, तब खिस्की ज़बान तले ज़मीन.

समोसा, आलू बोंडा और मंगोड़े भी देते है टक्कर,
पर कौन रह सकता है कचोरी के स्वाद से बचकर.

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विस्फोट, तुम फिर आ गए!

विस्फोट, तुम फिर आ गए!
जीवन की कीमत तो तुमने समझी नहीं
कम से कम
भय की परिभाषा तो समझ लेते.

मुंबई शहर में लोग हर क्षण है मरते
ज़िन्दगी की भागदौड़ में दबते कुचलते
इस भाग दौड़ थकान के बीच
किसे है समय भयभीत होने का.

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काश ये दिल होता Tupperware का

हम प्यार करते थे उनसे बेशुमार,
उनके इश्क मैं हुए थे बीमार
हमे लगा वो भी है उतनी ही बेक़रार,
कर बैठे प्यार का इज़हार.

फिर क्या कहे क्या हुआ
अच्छे खासे दिल का मालपुआ हुआ,
दिल तो हमारा था कोमल और नाज़ुक
पर जब टूटा तो आवाज़ आई जैसे चले कोई चाबुक,
कांच की तरह टुकड़े हुए उसके हज़ार,
सारे अरमानो का हुआ मच्छी बाज़ार.

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