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Category: Hindi (page 1 of 4)

पलायन

घूमता-खोजता, चलता-फिरता, फिर निकल चला मैं। पहले शिक्षा, फिर नौकरी, फिर शिक्षा और दूसरी नौकरी। कभी क़स्बा, कभी शहर, कभी देश, कभी विदेश। हर जगह संभावनाएं खोजता, कभी दुसरो को, कभी खुद को ढ़ुंढ़ता। प्रवासी कहिये या अप्रवासी, जड़ो से उजड़ा हुआ कहिये या जड़हीन। घूमता-खोजता, चलता-फिरता, फिर निकल चलूँगा मैं।

क्या हिंदी जीवित रहेगी?

आखिरी सासें लेती,
थकी-हारी, चरमराई,
हिंदी की जो है हालत,
उसे बचा सके दवा न दुहाई।

अंग्रेजी का अत्यधिक उपयोग,
नहीं है इसका कारण,
ना ही इस बात पे रोने से,
टलेगा इसका मरण।

हिंदी के पुनर्जन्म का,
बस एक ही है रास्ता,
अपने स्तर पर उसका प्रचार,
और भाषा के प्रति सच्ची आस्था।

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मलहम-ए -खिचड़ी

आपको देख दिल पे चल जाती है अभी भी छुरिया,
पर आपने तो फेका था हमें जैसे सीली हुई भुजिया।

खा पी कर ले रही हो तुम डकार,
पर क्या कभी याद किया तुमने पुराना प्यार?

धराशायी मन, टूटे दिल की सिसकी, सोचा शांत करू इसे मार मदिरा की चुस्की।

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भुलक्कड़ भारत

मैं:

विचलित मन, कुंठित जीवन,
दिशाहीन, घटनाओं से सहमा, घबराया हुआ।
हर क्षण है मरता मेरे अन्दर यह भारत,
और भारतीयता की भावना।

वो:

विनष्ट तन, निर्जीव जीवन,
मैं ही थी वो घटना जिसने तुम्हे था जगाया।
मेरी मृत्यु के साथ मरी वो कल्पना,
जिसे हमने भारत कहलाया।

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किम्कर्त्व्यविमुढ

सब कुछ  था स्थिर, अविचलित, शांत सा,
अचानक से इस दुविधा ने लाया एक बवंडर सा।

क्या करे क्या ना करे के दोराहे पर मैं हु खड़ा,
असमंजस से जूझता, पर इरादों पर अड़ा।

इस पार है निराशा, उस पार आशा की किरण,
बीच मझदार का सफ़र है, जिस पर तय होगा जीवन-मरण।

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